Tuesday, June 9, 2020

बिरसा मुंडा: एक महानायक की कहानी

           बिरसा मुंडा: एक महानायक की कहानी
             
 बिरसा मुंडा

( 15 नवंबर 1875 - 9 जून 1900 )


                           







बिरसा मुंडा भारत के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे। अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में उनकी ख्याति जग जाहिर थी। सिर्फ 25 साल के जीवन में उन्होंने इतने मुकाम हासिल किये कि हमारा इतिहास सदैव उनका ऋणी रहेगा।

बिरसा पढ़ाई में बहुत होशियार थे इसलिए लोगों ने उनके पिता से उनका दाखिला जर्मन स्कूल में कराने को कहा। पर इसाई स्कूल में प्रवेश लेने के लिए इसाई धर्म अपनाना जरुरी हुआ करता था तो बिरसा का नाम परिवर्तन कर बिरसा डेविड रख दिया गया।


कुछ समय तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल छोड़ दिया | क्योंकि बिरसा के मन में बचपन से ही साहूकारों के साथ-साथ ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह की भावना पनप रही थी।

इसके बाद बिरसा ने जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ़ लोगों को जागृत किया तथा आदिवासियों की परम्पराओं को जीवित रखने के कई प्रयास किया। 

बिरसा मुंडा प्रकृति को मानते थे वह पाखण्ड और अंधविश्वास के खिलाफ भी थे । उन्होंने अपने समर्थकों से भूत ,प्रेत ,आत्मा एवं अनेक भगवान को नही माने को कहा, साथ ही साथ उन्होंने अपने समाज को शराब , जीव हत्या कर के मास का सेवन नही करना,पशु के प्रतीक प्रेम रखना और साफ सुथरा रहने को कहा।

बिरसा जानते थे कि उनके समाज बहुत भोला भाला थे तो उन्होंने आदिवासियों समाज को कोई फैसला लेने से पहले पंचायत में मिलकर फैसला ले क्योकि उस समय अंग्रेज और साहूकार दोनों आदिवासियों के जमीन हड़प लेते थे और लगान अधिक वसूली की जाती थी।
बिरसा ने 25 साल के उम्र में ही अंग्रेजों हुकूमत के लिए खतरे हो गए थे।
1894 में बारिश न होने से छोटा नागपुर में भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी। बिरसा ने पूरे समर्पण से अपने लोगों की सेवा की। उन्होंने लोगों को अन्धविश्वास से बाहर निकल बिमारियों का इलाज करने के प्रति जागरूक किया। सभी आदिवासियों के लिए वे ‘धरती आबा’ यानि ‘धरती पिता’ हो गये।
अंग्रेजों ने ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट 1882’ पारित कर आदिवासियों को जंगल के अधिकार से वंचित कर दिया। अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वो गाँव, जहां वे सामूहिक खेती करते थे, ज़मींदारों और दलालों में बांटकर राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी। और फिर शुरू हुआ अंग्रेजों, जमींदार व महाजनों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों का शोषण।
इस शोषण के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी फूंकी बिरसा ने। अपने लोगों को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए बिरसा ने ‘उलगुलान’ (जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी ) की अलख जगाई।
1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन की लड़ाई छेड़ी। यह सिर्फ कोई बग़ावत नहीं थी। बल्कि यह तो आदिवासी स्वाभिमान, स्वतन्त्रता और संस्कृति को बचाने का संग्राम था।
बिरसा ने ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ यानि ‘हमारा देश, हमारा राज’ का नारा दिया। देखते-ही-देखते सभी आदिवासी, जंगल पर दावेदारी के लिए इकट्ठे हो गये। अंग्रेजी सरकार के पांव उखड़ने लगे। और भ्रष्ट जमींदार व पूंजीवादी बिरसा के नाम से भी कांपते थे।
अंग्रेजी सरकार ने बिरसा के उलगुलान को दबाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन आदिवासियों के गुरिल्ला युद्ध के आगे उन्हें असफलता ही मिली। 1897 से 1900 के बीच आदिवासियों और अंग्रेजों के बीच कई लड़ाईयां हुईं। पर हर बार अंग्रेजी सरकार ने मुंह की खाई।


जिस बिरसा को अंग्रेजों की तोप और बंदूकों की ताकत नहीं पकड़ पायी, उसके बंदी बनने का कारण अपने ही लोगों का धोखा बनी। जब अंग्रेजी सरकार ने बिरसा को पकड़वाने के लिए 500 रूपये की धनराशी के इनाम की घोषणा की तो किसी अपने ही व्यक्ति ने बिरसा के ठिकाने का पता अंग्रेजों तक पहुंचाया।

BIRSHA MUNDA
AMBEDKAR MEMORIAL PARK , LUCKNOW(U.P)


जनवरी 1900 में उलिहातू के नजदीक डोमबाड़ी पहाड़ी पर बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे, तभी अंग्रेज सिपाहियों ने चारो तरफ से घेर लिया। अंग्रेजों और आदिवासियों के बीच लड़ाई हुई। औरतें और बच्चों समेत बहुत से लोग मारे गये। अन्त में बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये।
9 जून 1900 को बिरसा ने रांची के कारागार में आखिरी सांस ली।


कुछ लोगो की शुत्र से  पता चलता है कि बिरसा को जेल के अंदर ही धीरे धीरे जहर दिया गया जिसके वजह से उनकी मौत हुई है...

आज भी हमे ऐसे महानायको की कमी है 

जय बिरसा
जय सेवा
जय भीम
जय भारत



Er Satyajeet Kurrey

Monday, June 8, 2020

हमे मजबूत नहीं मजबूर सरकार चाहिए

हमे मजबूत नहीं मजबूर सरकार चाहिए 


मान्यवर साहब कांशीराम से जब पत्रकार प्रश्न करते तो साहब ऐसा सटीक जवाब देते कि पत्रकारों की बोलती बंद हो जाती और दूसरा प्रश्न न का पाते। एक बार पत्रकार न कहा साहब क्या आप भारत की मजबूत सरकार चाहते हैं? साहब ने जवाब दिया हमें मजबूत नहीं हमें मजबूर सरकार चाहिए, हमें उस वक्त तक कमजोर केन्द्र की जरूरत है जब तक हम खुद कमजोर हैं।

हालांकि ये भी सच है अगर बार-बार चुनाव होता है तो सरकार का पैसा बहुत खर्च होता है, परन्तु साहब इस बात को जानते थे कि जितनी भी बार चुनाव होगा, उतनी ही बार हमारे लोग जागरूक होंगे वोट बैंक भी बढ़ेगा. बार-बार चुनाव होने से मजदूर, कमेरा वर्ग(बहुजन समाज) आगे आयेगा तथा मजदूर कमेरा वर्ग ही आम आदमी की भलाई के बारे सोच सकेगा। इसके अलावा साहब चुनाव में कम से कम खर्च हो इसके लिए भी ज्ञापन दे चुके थे। 

एक बार पत्रकार ने कहा 'साहब आप जानते हो कि आपने चुनाव जीतना नहीं, फिर भी आप चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े कर देते हो, ऐसा क्यों? साहब ने जवाब दिया 'हम पहली बार चुनाव लड़ते हैं हारने के लिए दूसरी बार चुनाव लड़ते है हराने के लिए और तीसरी बार चुनाव लड़ते हैं, खुद जीतने के लिए।
 इस प्रकार साहब की नपे तुले शब्दों की शब्दावली सभी का प्रभावित करती थी।




Er Satyajeet Kurrey

Friday, June 5, 2020

संत कबीर दास जी जयन्ती के शुभ अवसर पर उन्हें शत शत नमन...

संत कबीर दास जी जयन्ती के शुभ अवसर पर उन्हें शत शत नमन......एवं समस्त देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं....

जय भीम
जय भारत
साहेब बंदागी....

Thursday, June 4, 2020

हमें समाज सेवा या प्रबोधन करना चाहिए.....

हमें समाज सेवा या प्रबोधन करना चाहिए.....

समाज सेवा
जिस शहर में मान्यवर कांशीराम साहब की रैली या सभा होती थी  । उन्हें अगर समय है, तो वह अपने कार्यकर्ताओं का कैम्प लेकर उनका मार्गदर्शन करते थे ।




मान्यवर कांशीराम साहब ने कहा था-"हम सेवा नही करते, बल्कि प्रबोधन करते हैं" । लोगों की या समाज के सेवा यानी किसी एक को नॉकरी पर लगा दिया, या तो उसके दुख या समस्या दूर कर दी । लोग सेवा के नाम पर अकसर यही करते हैं । किसी भूखे को भोजन देकर भूख मिटा दी । ऐसी समस्या से मुक्त कर दिया या किसी को अपने पैसे देकर कर्जमुक्त कर दिया । किसी गरीब को पाठ्य पुस्तकें दे दी या तो उसे कपड़े दान कर दिए । यह सब सेवाएं हैं ।


 यही लोग समाज सेवक बनते हैं । अपनी सेवा के बदले फिर समाज से हिसाब-किताब करते हैं । फिर आमदार-खासदार बनकर सौ पीढ़ियों की ब्यवस्था करते हैं । यही भारत के समाज सेवक हैं, जो बाद में समाज के ही सर पर बैठ जाते हैं । बहुत से विधायक, खासदारों का लगभग यही इतिहास है । पर प्रबोधन बिलकुल दूसरी चीज है ।

समाज प्रबोधन
प्रबोधन का मतलब ही लोगों को शिक्षित ही नही, प्रशिक्षित भी करना है । प्रबोधनकार ऐसे काम करता है कि समाज में कोई गरीब न रहे, कोई अमीर न रहे । सबकी जरूरते पूरी हों । ऐसी समाज ब्यवस्था निर्माण करने की सोचता है, ताकि कोई भूखा न हो, कोई बेगार व बेकाम  न हो । 
इसी कड़ी में समाज प्रबोधन का कार्य गौतम बुद्ध जी, संत माता कर्मा जी, संत कबीर साहब, संत रविदास जी, परम् पूज्य बाबा गुरु घासीदास जी, महामना ज्योतिबा फुले जी, छत्रपति शाहू जी (कुर्मी) महाराज, बिरसमुंडा जी, संत गाडगे बाबा जी, पेरियार रामास्वामी नायकर जी, बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी व बाद में मान्यवर कांशीराम साहब ने किया  । मान्यवर कांशीराम साहब ने जीवन भर आंदोलन व कार्यक्रम किए । उनके कार्यक्रम ही ऐसे थे कि लोगों के जीवन मे बदलाव आए, नया विचार चक्र चालू हो, अपने दुखों का अहसास हो, व उसका उपाय भी हमें अवगत होने लगा । 
अतः हमें इन महापुरुषों की तरह भी समाज प्रबोधन करने का प्रयास करते रहना चाहिए ।

जय सेवा, जय सतनाम,जय भीम


रमेश जाटवर
(लेखक)

सत्ता के द्वारा नियंत्रित अलगाववादी आन्दोलन


       सत्ता के द्वारा नियंत्रित अलगाववादी आन्दोलन




दुनिया के महान विद्वान डाॅ.बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जी ने यूं ही नहीं कहा था कि-
"राजनीतिक सत्ता वो मास्टर चाबी है जिसे अगर देश के गरीब, दलित, कमज़ोर वर्ग किसी भी तरह से हासिल कर ले तो वो अपनी हर प्रकार की समस्या रूपी ताले को खोल सकता है।"



क्योंकि सत्ता के पास असीमित पाॅवर होता है। जिसके द्वारा वो जो चाहे वो कर सकती है। जिसको भी मारना चाहे, मार सकती है। जिसकी रक्षा करनी हो कर सकती है। जिसको बरबाद करना हो, कर सकती है। जिसको आबाद करना हो, कर सकती है। जिसको जेल भेजना हो, भेज सकती है। जिसको बचाना हो, बचा सकती है। इसलिए इस देश के कमज़ोर, गरीब,दलित,आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक व सर्व समाज के प्रताड़ित लोगों को एकजुट होकर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी खुद की सत्ता हासिल करने का प्रयास करना चाहिए, उसके अलावा इनके पास और कोई विकल्प नहीं है।

जब जब भी सत्ता के विरुद्ध कोई भी क्रान्तिकारी आन्दोलन की शुरुआत हुई है तब तब सत्ता ने अपने असीमित पाॅवर के दम पर उस आन्दोलन को कुचलने का काम किया है और जब वह आन्दोलन दमनकारी तरीकों से भी नियंत्रित नहीं होती या खत्म नहीं होती तब सत्ता के द्वारा उस आन्दोलन को ही अपने नियंत्रण में लिया जाता है। क्योंकि किसी भी बड़े आन्दोलन को बहुत दिनों तक भूखे प्यासे नहीं चलाया जा सकता या गरीबों के सहयोग से ही उस आन्दोलन का संचालन नहीं किया जा सकता। आन्दोलन को गतिमान बनाये रखने के लिये संसाधनों की आवश्यकता होती है। और सत्ता ये बखूबी जानती है कि आन्दोलनकारी को भी भूख लगती है, उसको भी अन्य संसाधनों की जरूरत पड़ती है। 




  तब वह आन्दोलनकारी योद्धाओं के नेतृत्व के साथ समझौता करती है कि आपको आपकी जरूरत की हर चीज़ मुहैया करायी जायेगी, बशर्ते आपको हमारे अनुसार चलना पड़ेगा। आप अपने आन्दोलन  को गरीबों के बीच में प्रचारित करते रहना, ये कहकर कि हम आपके हक अधिकार की लड़ाई ही लड़ रहे हैं।

लेकिन आपको कब, किसको और कहाँ मारना है ये हम तय करेंगे। और इस तरह से सत्ता और तथाकथित अलगाववादी नेताओं के बीच अघोषित समझौता हो जाता है, और इस खेल में सबसे ज्यादा जिसको नुकसान होता है, वो है गरीब आदमी। जो मजबूरी या दबाव में अलगाववादी आन्दोलन में शामिल हो जाता है या फिर मजबूरी और गरीबी की वजह से सत्ता की सेना में भर्ती हो जाता है। दोनों तरफ से सिपाहियों को लगातार ट्रेनिंग देकर एक दूसरे के खिलाफ इतना ज्यादा दुश्मनी का भाव भर दिया जाता है कि दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। फिर सरकारी पूंजीवाद और गरीबों के नाम से फायदा उठाने वाले तथाकथित क्रांतिकारी अपने फायदे के लिये दोनों तरफ से लड़ने वाले सिपाहियों को मरवाने का काम करते हैं और दोनों तरफ से मलाई खाने का काम करते हैं। 





इसलिए मानवाधिकार के लिये काम करने वाले कार्यकर्ता भी हमारे ग़रीब समाज के लोगों को सत्ता हासिल करने का फार्मूला बताये। ना कि जो सत्ता में हैं उनके सामने बार बार हड़ताल आन्दोलन कर करके समाज को हमेशा सत्ता के सामने मांगने वाला भिखारी बनाकर पेश करते रहें। मैं तो एक राजनीतिक पहचान के साथ अपने समाज को राजनीतिक सत्ता की मास्टर चाबी हासिल करने के लिये ही समझाता हूँ। उसमें मैं कितना सफल होता हूँ या नहीं ये मेरे प्रयासों के ऊपर है, लेकिन जो मेरे तरीके को पसंद नहीं करते हैं उनको भी यही चाहिए कि हमारे बस्तरिया समाज को अपने तरीक़े 
से जो उनको सही लगे राजनीतिक सत्ता के महत्व को बताने का काम करे।


 उन्हें पूंजीपतियों के हित में काम करने वाली नहीं गरीबों के हित में काम करने वाली सरकार बनाने के लिये प्रेरित करें। क्योंकि ये काम अगर हमारा पढ़ा लिखा तबका नहीं करेगा तो हर चुनाव में पूंजीपतियों का करोडों रुपये खर्च करके गरीबों का वोट लिया जायेगा फिर सरकार बनने के बाद उन्हीं पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिये गरीबों को किसी न किसी बहाने से मरवाने का काम किया जाता रहेगा। और हम लोग इस बात को गंभीरता से नहीं लेंगे तो फिर हम केवल ताली और थाली ही पीटते रह जायेंगे।




 
                     हेमंत पोयाम             
         (लेखक)

 








बेजुबान हाथी का दर्द

बेजुबान हाथी का दर्द



कोरोना ने इंसान को उसकी औक़ात बता दी है 
पर इंसान को न शर्म आयी है न वो प्रकृति से खिलवाड़ करने से पीछे हटा है। केरला  में एक भूखी गर्भवती हथिनी इंसान पर भरोसा कर लेती है । कई दिन से भूखी होने पर वो इंसान के दिए अनन्नास को खा लेती है ... 
लेकिन इंसान को देखिए, जिसकी फ़ितरत में ख़ुदगर्ज़ी और धोखा है !
उसके लिए उसमें पटाखे भर कर रखेथे।मुँह में पटाखे फट जाते हैं और चोटिल मुँह की जलन बुझाने वो हथिनी किसी तरह नदी तक पहुँचती है... पर पानी में खड़े-खड़े उस बेज़ुबान की गर्भ में पल रहे बच्चे समेत जान चली जाती है !


यहाँ ये बात बताना ज़रूरी है कि उस असहनीय पीड़ा में भी हथिनी कोई तोड़फोड़ नहीं करती....
साथ ही ये भी कि केरल में साक्षरता को उदाहरण के रूप में अक्सर पेश किया जाता है ...

अब जिस इंसान की फ़ितरत में सिर्फ़ स्वार्थ हो तो प्रकृति उसे सबक़ सिखाए तो आश्चर्य की बात क्या ?


ये दुनिया सबकी है 
Elephant






          नीकु कुमार
           (लेखक)



Wednesday, June 3, 2020

चलिए आज हम बात करते है, अपने सामाजिक दायित्व की .....

चलिए आज हम बात करते है, अपने सामाजिक दायित्व की ...


यह ठीक वैसा ही प्रश्न है, जैसा कि, एक संतान का अपने 
माता-पिता के प्रति क्या दायित्व और जवाबदेहीता होना चाहिये 
वैसे आम तौर पर हमेशा बात लेने की आती है, जैसे- मुझे क्या मिलेगा, मुझे क्या दिया, मेरा क्या फायदा होगा, मेरा क्या मतलब है, मुझे क्या     लेना-देना है । 
व्यक्ति अपने माता-पिता से भी, यह उम्मीद करता है, और अपने देश से भी, साथ ही उम्मीद करता है कि मुझे मेरे समाज से क्या मिलेगा और क्या मिलने की उम्मीद है । 
इसी गणित मे लगा रहता है, या कहे की, हमेशा उसकी स्थिति भिखारी की तरह ही बनी रहती है।उक्त पहलू पर व्यक्ति, अपने दिन के 24 घंटे, 365 दिन, साथ ही सम्भव हो तो, प्रत्येक सैकण्ड, कुछ पाने की जुगाड़ मे लगा रहता है । कितनी विचित्र स्थिति है कि, प्रकृति ने जिस इन्सान को इतना 

बुद्धिमान

 बनाया कि, वो चन्द्रमा पर चला गया, लेकिन उसके बाद भी, उसकी मानसिक दशा बदली नही है ।


क्या हम इन्हें इन्सान कहे, तो यह 100 फिसदी तो सच नही हो सकता । इस दुनिया मे यदि श्रेष्ठतम कोई है तो वह इन्सान । दुनिया का श्रेष्ठतम इन्सान भी भिखारी बन जाता है तो, उसमे पशु के लक्षण आने स्वाभाविक है ।

SANJAY MIRI
तो फिर हमे क्या करना चाहिये, हमे यह कभी नही भूलना चाहिये कि, व्यक्ति के अधिकार, दायित्व और जवाबदेहीता साथ-साथ चलते हैं । यदि वो अधिकारों को धारण करता है तो उसे दायित्वों का भी निर्वाह करना ही होगा । इसके लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार नही ठहराया जा सकता । यह ध्यान रहे कि, जब व्यक्ति का जन्म समाज में होता है तो, समाज में जन्म के साथ ही, उसको कुछ अधिकार प्राप्त हो जाते हैं और साथ उसका समाज के प्रति दायित्व भी उत्पन्न होता है ।

 आज समाज के सामाजिक परिवेश की बात करे तो, 
इतिहास गवाह है कि, समाज को दिशा देना, उसका मार्गदर्शन करना, समाज के बुद्विमान लोगों का दायित्व है । 


वे अपने दायित्व से पीछे नही हट सकते, क्योंकि आज भारत आजाद है तो, यह आजादी किसी गरीब या धनवान लोगों की देन नही है । 
यह बुद्विमान देशभक्त लोगों की मेहनत बलिदान का ही परिणाम है । आज जो भी परिवार, समाज विकसित व साधन सम्पन्न हुये है, वे सभी समाज के बुद्विजीवी लोगों के त्याग व मेहनत के कारण है । 



अब प्रश्न उठता है कि, जो परिवार व समाज पिछड़े है उसके पीछे मूल कारण क्या है, इसका भी सीधा सा उत्तर है कि, इसके पीछे भी एहसान फरामोश बुद्विमान लोग है, जिन्होंने समाज से लिया तो सब कुछ, लेकिन जब देने की बारी आई तो अपनी अक्कल का उपयोग करते हुए, किनारा कर दिया और अगुंठा बता दिया ।
पिछड़ेपन की बात करे तो, यह समस्या अधिकतर दलित वर्ग मे है, और कही-कही आदिवासीयों मे भी विधमान है । 


यह बात केवल मै ही नही कह रहा हूँ, यह बात आज से 50 वर्ष पूर्व बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर कहकर चले गये । उन्होने आरक्षण जैसा चमत्कारिक अधिकार दिया । जिसके कारण एक व्यक्ति स्कूल, कॉलेज मे प्रवेश से लेकर नोकरी पाने तक अपने इस अधिकार का प्रयोग, इतने आत्मविश्वास के साथ करता है, जैसे की खरीदा हुआ हो, और फायदे पर फायदे लिये जा रहा है।
आज भी यही हो रहा है । आज यदि कुछ अच्छे लोगों को छोड़ दे तो लगभग सभी सरकारी कर्मचारी इसमें शामिल नजर आते हैं, क्योंकि आज देखा जाऐ तो, मूलनिवासियों का विकास सरकारी नोकरी के बलबूते ही हुआ है, क्योंकि इन्होंने आरक्षण के अधिकार से नोकरी ले ली, लेकिन इसके बदले समाज के प्रति दायित्व नही निभाने के कारण, आज समाज भी पिछड़ा है और वह स्‍वयं भी व्यक्गित रूप से कमजोर है । यह बीमारी अधिकतर मूलनिवासी अधिकारियों में है ।


 देश के 30 प्रतिशत मूलनिवासियों का हक, 3 प्रतिशत मूलनिवासी सरकारी कर्मचारी खा रहे हैं । उन्हे यह दिखाई नही दे रहा है और यदि उन्हे आयना भी बताये तो किसकी हिम्मत, क्योंकि कोई इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था से पंगा लेना नही चाहता । कारण है कि, मेरा क्या लेना-देना, मेरा क्या फायदा, ऐसे प्रश्न उसके अन्दर उत्पन्न होने लग जाते है और उसके आस-पास ऐसी ही राय देने वाले लोग, जो उसे कमजोर बनाते हैं । फिर याद आती है बाबा साहेब की, जो इतनी विषम परिस्थितियों मे ऐसा काम करके चले गये, जिसकी हम कल्पना भी नही कर सकते । फिर कही हिम्मत बढती है कि, हम तो आज उनसे कही गुना अधिक अच्छी स्थिति मे है ।


यही सोचकर यह सच्ची बात, बयान कर रहे हैं ।
तो फिर हम क्या करे, हमे अपने अन्दर त्याग की भावना पैदा करनी होगी तथा इस बात पर विचार करना होगा कि इस समाज मे पैदा होकर, हमने समाज को क्या दिया, समाज ने हमे गाड़ी, बंगला, राज-पाट, एश-आराम, धन-दौलत, सुख सभी दिया, इसके बदले मे हमने क्या दिया । यह कोई उधार नही है, यह तो ऋण है, समाज का हमारे ऊपर, जिसे हमे हर हालत में उतारना है । यदि हम, इस ऋण को नही चुकाते हैं तो, हमारा जीवन तो पशु समान ही रह जायेगा ।


मेरा उन सभी लोगों को सन्देश है कि, जो अपनी उम्र के अन्तिम पड़ाव में हैं, यह मंथन करे कि, उन्होंने इस समाज मे पैदा होकर, समाज को क्या दिया है । आपने, अपने जीवन में बुद्धि, अनुभव तथा मह्त्वपूर्ण समय और  लाखों करोड़ो रूपये कमाऐ हैं, जिसमें कुछ ईमानदारी से और कुछ बेईमानी से । इसमें कुछ हिस्सा यदि हमने समाज कल्याण मे दान कर दिया तो, आपकी भावी पीढ़ी पर कोई फर्क नही पड़ने वाला है ।
उदाहरण के लिये यदि अपनी आय का कुछ हिस्सा दान कर दिया है, तो भी बेटा, बाप को बाप ही कहेगा और उसका परिणाम यह होगा की, आपका समाज के प्रति दायित्व भी पूर्ण होगा और आपको समाज सम्मान भी देगा,


नतीजा आपकी संतान भी आपका अधिक सम्मान करेगी, जो आपकी भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्त्रोत रहेगा और समाज का विकास भी होगा । जो कही न कही आपके परिवार का ही हिस्सा है । आपको इसे जिम्मेदारी के तोर पर मानना होगा और आपकी यह जिम्मेदारी मे भी आता है । आप इस जवाबदेहीता से किनारा नही कर सकते । इस किनारे के कारण ही, आज तक, समाज पिछड़ा, गरीब, साधन विहीन बना हुआ है ।


अधिकतर देखने मे आता है कि, दूसरे लोग तो समाज के लिए कुछ करते नही, तो मैं क्यू करू, तो बहुत साफ है कि, वे अपने आप को इन्सान तो कहते हैं, लेकिन ऐसा कुछ करते नही । मेरा मानना है कि, हमे इन्सान बनने का प्रयास करना चाहिए क्‍योंकि, इन्सान ही दूसरे के लिये कुछ कर सकता है, पशु नही ।


अन्त मे एक छोटी सी बात
महान योद्धा युद्ध जीतकर सम्राट बन गया, 
लेकिन मरने से पहले, उसने अपने लोगों से कहा कि, मेरे दोनों हाथ कब्र से बाहर रख देना, क्‍योंकि दुनिया मे देखने वालों को पता चले कि, मैं दुनिया मे खाली हाथ आया था, खाली हाथ जा रहा हूँ, 
साथ कुछ नही ले जा रहा हूँ ।
कुछ बुरा लगे, लेकिन यह सच है । 
कहते है कि, सच हमेशा कड़वा होता है और मैं भी यही कह रहा हूँ । 
मैने अनुसरण किया है, आप भी करे, बहुत खुशी मिलेगी । हमे अपने जीवन मे, अपना त्याग तो, निर्धारित करना ही होगा । 


अक्सर सुनने मे आता है कि फलाना-फलाना व्यक्ति दुनिया छोड़ गये, पहले तो मुझे बहुत दुख होता था, लेकिन अब सोचता हूँ कि, वो जिंदा थे, तब समाज के लिए क्या फायदा था, जो मरने पर नुकसान हो गया । लोग कहते है कि, अच्छा व्यक्ति था, मे कहता हूँ कि, कैसे, मुझे समझाये । केवल अपनी पत्नि, बेटा-बेटी के लिए अच्छे होंगे, हमारा क्या लेना-देना । 

इसलिए हमे निजी स्‍वार्थों की परिधी से बाहर निकलकर, कुछ त्याग करने की आवश्यकता है, जल्दी करे, समय जा रहा है, कुछ करना है तो, कर दे, अन्यथा पछतावे के अलावा और कुछ नही मिलेगा ।



जय भीम
राकेश कुमार डिस्पाट
(लेखक)














Tuesday, June 2, 2020

संसद चलो, अपने पैरों पर चलो

संसद चलो, अपने पैरों पर चलो

मान्यवर कांशीराम साहब ने अपने जीवन मे बहुत से आंदोलन व कार्यक्रम किए उन सबका उद्देश्य अपने लक्ष्य की पूर्ति और बहुजन समाज को जागरूक व सावधान करने के लिए था । एक बार मान्यवर साहब ने "संसद चलो, अपने पैरों पर चलो" नाम का आंदोलन किया था । इसका मतलब था कि अगर हम दूसरी पार्टी के मातहत व बल पर संसद या विधानसभा में चुनकर जाते हैं तो उनके बंधुआ मजदूर बन जाते हैं  हम अपने उद्देश्य की पूर्ति नही कर सकते। आज बीजेपी, कांग्रेस में बहुत से एस. सी./एस.टी. के विधायक व सांसद हैं पर उनके ही समाज पर रात-दिन अन्याय, अत्याचार होते हैं, परन्तु वे अपने मुंह पर ताला लगाकर चुप रहते हैं । वे उनके नाम व उनके ताकत से चुनकर आते हैं इसलिए अपने समाज के लिए कुछ नही कर सकते  वे मनुवादी और उनके गुलाम होते हैं उन्हें विवेक बुद्धि नहीं होती, होती भी है, तो उसका उपयोग नहीं कर सकते, यदि उन्होंने जरा भी अपनी अक्ल का उपयोग किया कि अगली बार उन्हें, या तो टिकट नही मिलती या मिली भी, तो उन्हें चुनकर नहीं आने दिया जाता ।
आज कितने ही एस. सी./एस. टी. के विधायक, सांसद हैं फिर भी उनकी जाति पर अत्याचार होते हैं । यह विधायक, सांसद, मंत्री कहलाने वाले लोग अपने समाज के लिए कुछ प्रतिक्रिया तक ब्यक्त नही दे सकते ।इसीलिए मान्यवर कांशीराम साहब ने कहा यदि अपने समाज के ऊपर हो रहे अन्याय, अत्यचार के खिलाफ बोलना चाहते हो तो "संसद चलो, अपने पैरों पर चलो" 


जय भीम




               रमेश जाटवर
                        ( लेखक )



जजमेंट दुनिया

स्त्रियों को लेकर शिक्षित समाज भी जजमेंटल और रूढ़िवादी है.... हैरानी तब होती है जब पढ़ा लिखे युवक/युवती भी इसी रूढ़िवादी समाज की हाँ में हाँ मिलाते हैं....
Zeeya Suryavanshi
Zeeya Suryavanshi





 उदाहरण --


(1) एक स्त्री का चरित्र तभी सही है जब वो लम्बे बाल रखे नहीं तो कोई लड़का शादी नहीं करेगा।


(2) एक स्त्री का रंग गोरा  होना चाहिए साथ ही सुगठित शरीर हो तभी लड़की अच्छे घर में ( पैसे वाला पति से) ब्याही जाएगी।


(3) एक स्त्री और पुरुष दोनों का प्रेम करना समाज के नजरिए में चरित्र हीनता है।


(4) एक स्त्री का शादी के बाद अपने से बड़े( जेठ/सास/ससुर.... आदि) के सामने घूँघट रखना बहुत जरूरी है नहीं तो वो चरित्रहीन लड़की है।

(5) एक स्त्री का शादी के बाद अपने लड़के मित्रों से मिलना और कॉल पर बात करना उसे चरित्रहीनता की श्रेणी में लाता है।


(6) एक स्त्री का 4 लड़को के बीच बात करना उसे चरित्रहीन बनाता है।


(7) एक स्त्री का शादी से पहले अपने प्रेम का "इजहार' करना( सोसल मीडिया पर अपनी फीलिंग्स और फ़ोटो डालना) उसे चरित्रहीन बनाता है।


(8) एक साँवली और काली लड़की को पहले उसके "चेहरे" से ही जज कर लिया जाता है।जबकि और भी बहुत सारी चीजें है....जो समाज(रूढ़िवादी+प्रगतिशील) द्वारा एक स्त्री को देखने का नजरिया निर्धारण कर देता है।  मुझे दुख और हैरानी इस बात की नहीं होती है कि कोई रूढ़िवादी व्यक्ति किसी स्त्री/पुरुष को जज करे ऊपर 8 बिंदुओं के हिसाब से।बल्कि हैरानी तब होती है जब वर्तमान के  युवक/युवती भी उपरोक्त 8 बिंदुओं के हिसाब से लोगों को जज करते हैं।      





















  Er.SUNIL JATWAR
            ( Writer )
     

स्टालिन का देहांत और बाबा साहब का कथन


B. R. Ambedkar

Baba Saheb Dr B. R. Ambedkar

कार्ल मार्क्स एक बहुत बड़े विद्वान थे । वह इंग्लैंड की लाइब्रेरी में दिनरात अध्ययन करते थे । अपने अध्ययन का निचोड़ उन्होंने कैपिटाल नामक ग्रंथ में लिखा था । अब तक के विद्वानों ने दुनिया की ब्याख्या की थी । मार्क्स ने दुनिया बदलने की योजना पर चर्चा की ।
  Karl Heinrich Marx
Karl Heinrich Marx
उस दिशा में मार्क्स ने बहुत काम किया था । उनके शिष्य लेनिन ने इस ग्रंथ पर  विचार करके उसे अमलीजामा पहनाने का कार्य किया कई जगह मार्क्स कम पड़े थे उनकी जगह लेनिन ने अपने हुनर से कार्य किया यह एक तरह का मार्क्स के विचारों को आगे ले जाने का कार्य था क्योंकि वह कमरे में बैठकर लिख रहे थे तो, लेनिन मैदाने जंग के खिलाड़ी थे, एक ही हुनर काम नही आ रहा था । इसलिए उन्हें पैंतरे बदलने पड़े थे  इस कारण मार्क्स छोटे नही हो गए उल्टे मार्क्स का यह लेनिन नामक शिष्य अपनी ऊँचाई बढ़ा रहा था । शिष्य के साथ गुरु की भी ऊँचाई बढ़ रही थी, लेकिन बहुत जल्द वे मौत को प्राप्त हुए । 
लेनिन का शिष्य स्टालिन था लेनिन की कमी स्टालिन ने पूरी कर दी उनके कुछ रुके हुए काम स्टालिन को करने पड़े अगर स्टालिन नही होते तो लेनिन की क्रांति खत्म हो जाती । कई जगह लेनिन अपर्याप्त लगे वहाँ पर स्टालिन ने अपनी बुद्धि व हुनर से काम किया ।
Joseph Vissarionovich Stalin
Joseph Vissarionovich Stalin
रूस की क्रांति जो लेनिन ने की थी उसे बड़ा रूप स्टालिन ने दिया था । स्टालिन का कार्य इतना बड़ा था कि एक पिछड़े देश को इतना प्रगति व सामर्थ्यशाली बना दिया कि पूरा यूरोप जितने वाले हिटलर को भी स्टालिन के सामने मात खानी पड़ी । इस आर्यवंशी हिटलर का विनाश स्टालिन के हाथों हुआ ।
5 मार्च 1953 में स्टालिन का रूस में देहांत हुआ, तो उसे श्रंद्धाजलि देते हुए बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर रो पड़े और बोले  कि  रूस का कायाकल्प एक चमार के हाथों हुआ था । काश, इस देश मे भी ऐसा चमार पैदा होता क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए किसी न किसी को पैदा होना पड़ता है या पैदा करना पड़ता है ।












जय भीम
रमेश जाटवर

हमारा प्रचार कैसा होना चाहिए

इसके लिए एक पुरानी कहानी लिखना चाहता हूँ । भिक्खु पणण भगवान बुद्ध के समय उनका संदेश फैलाने के लिए मथुरा प्रदेश में जाना चाहते थे । उन्होंने भगवान बुद्ध से जाने की अनुमति मांगी । भगवान बुद्ध ने कहा  पणण, वहाँ के लोग भयंकर हैं  । वह तुम्हे गाली गलौच करके अपमानित भी कर सकते हैं ? पणण कहते हैं- "मैं समझूंगा, उन्होंने सिर्फ मुझे गाली ही दी । वे मुझें मार भी सकते थे ।" 

भगवान बुद्ध ने कहा-"वे तुम्हारे हांथ-पांव भी तोड़ सकते हैं ।" पणण  कहते हैं-"भगवान! मैं समझूंगा वे मुझे जान से मार भी सकते थे । अभी तो सिर्फ हांथ-पांव ही तोड़े हैं।" आखरी परीक्षा लेते वक्त भगवान बुद्ध  कहते हैं-"तुम उनकी मान्यता व विचार के विरुद्ध मेरा संदेश बताओगे, तो बहुत संभव है कि वह तुम्हे जान से भी मार देंगे ।" भिक्खु पणण कहते हैं-"भगवान तब तो मैं उनका आभारी ही रहूंगा, क्योंकि उन्होंने मेरा जन्म-मृत्यु का फेरा ही खत्म कर दिया है ।" पास मे बैठे भिक्खुओं व उपासकों ने साधु-साधु की गर्जना करते हुए आनन्द ब्यक्त किये । भगवान बुद्ध कहते हैं-"जाओ! पणण जो मृत्यु के पार चला गया है, उसे कोई नही मारता ।" 


ऐसी ही मिलती-जुलती बात बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी ने कही थी । उनका मतलब था जिन लोगों को अपना चरित्र और पावन लक्ष्य पर विश्वास है, वे धन्य हैं । जो मान की, अपमान की परवाह नही करते, वे धन्य हैं ।जो बारिश की, गर्मी की, ठंडी की, जंगलों की, रेतीले मैदानों की परवाह न करते हुए अपने मिशन को आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं, वे धन्य हैं । इससे भी ज्यादा हम क्या कह सकते हैं । 
एक बार मान्यवर कांशीराम साहब ने कहा था-"इस शरीर से जितना बन सके, उतना काम करना चाहिए बाद में यह तो मिट्टी में मिल जाना है ।" 





संत कबीर साहब ने भी कहा है--ए
इस तन मन की कौन बड़ाई ।
देखत, इसको तो मिट्टी मिलाई ।।




जय भीम 


रमेश जाटवर

रमेश जाटवर
(लेखक)




सुनो कल के लड़को जितनी तुम्हारी उम्र भी नही हैं.. उतना 41 साल का तो बहन जी का सँघर्ष हैं.

👉सुनो कल के लड़को जितनी तुम्हारी उम्र भी नही हैं.. उतना 43 साल का तो बहन मायावती जी का सँघर्ष हैं.👈 यही हैं वो मासूम सी लड़की जो...