इसके लिए एक पुरानी कहानी लिखना चाहता हूँ । भिक्खु पणण भगवान बुद्ध के समय उनका संदेश फैलाने के लिए मथुरा प्रदेश में जाना चाहते थे । उन्होंने भगवान बुद्ध से जाने की अनुमति मांगी । भगवान बुद्ध ने कहा पणण, वहाँ के लोग भयंकर हैं । वह तुम्हे गाली गलौच करके अपमानित भी कर सकते हैं ? पणण कहते हैं- "मैं समझूंगा, उन्होंने सिर्फ मुझे गाली ही दी । वे मुझें मार भी सकते थे ।"
भगवान बुद्ध ने कहा-"वे तुम्हारे हांथ-पांव भी तोड़ सकते हैं ।" पणण कहते हैं-"भगवान! मैं समझूंगा वे मुझे जान से मार भी सकते थे । अभी तो सिर्फ हांथ-पांव ही तोड़े हैं।" आखरी परीक्षा लेते वक्त भगवान बुद्ध कहते हैं-"तुम उनकी मान्यता व विचार के विरुद्ध मेरा संदेश बताओगे, तो बहुत संभव है कि वह तुम्हे जान से भी मार देंगे ।" भिक्खु पणण कहते हैं-"भगवान तब तो मैं उनका आभारी ही रहूंगा, क्योंकि उन्होंने मेरा जन्म-मृत्यु का फेरा ही खत्म कर दिया है ।" पास मे बैठे भिक्खुओं व उपासकों ने साधु-साधु की गर्जना करते हुए आनन्द ब्यक्त किये । भगवान बुद्ध कहते हैं-"जाओ! पणण जो मृत्यु के पार चला गया है, उसे कोई नही मारता ।"
ऐसी ही मिलती-जुलती बात बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी ने कही थी । उनका मतलब था जिन लोगों को अपना चरित्र और पावन लक्ष्य पर विश्वास है, वे धन्य हैं । जो मान की, अपमान की परवाह नही करते, वे धन्य हैं ।जो बारिश की, गर्मी की, ठंडी की, जंगलों की, रेतीले मैदानों की परवाह न करते हुए अपने मिशन को आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं, वे धन्य हैं । इससे भी ज्यादा हम क्या कह सकते हैं ।

एक बार मान्यवर कांशीराम साहब ने कहा था-"इस शरीर से जितना बन सके, उतना काम करना चाहिए बाद में यह तो मिट्टी में मिल जाना है ।"
संत कबीर साहब ने भी कहा है--ए
इस तन मन की कौन बड़ाई ।
देखत, इसको तो मिट्टी मिलाई ।।
जय भीम
रमेश जाटवर
(लेखक)


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